तुलसी गौड़ा
एकांत की पीड़ा को विशाल वट वृक्ष में परिवर्तित करने की कला आपको प्रकृति की देवी बना सकती है ,यह तुलसी गौड़ा के जीवन को देखकर जाना जा सकता है | बहुत कम आयु में पिता की मृत्यु होने के बाद तुलसी ने अपनी मां और बहन के साथ काम करना शुरू कर दिया। तुलसी जब लगभग 11 साल की थी तब उनका विवाह हुआ । परंतु कुछ समय बाद तुलसी गौड़ा के पति की भी मृत्यु हो गई । पीड़ा के जीवन से जो बीज फूटा उसने बंजर धरती को पेड़ों से भर दिया |
तुलसी गौड़ा ने किशोर आयु मे ही अपने घर के पीछे की बंजर भूमि को घने जंगल में बदल दिया था । वन विभाग से जुड़े रहे 86 साल के रेड्डी बताते हैं कि पेड़ पौधों को पहचानने की कला तुलसी गौड़ा मे बेमिसाल है | पेड़ -पौधों से जुड़ा जो ज्ञान पुस्तकों मे नहीं मिलता वह तुलसी गौड़ा को पता होता है | इस बात से प्रभावित होकर रेड्डी ने तुलसी को अपना सलाहकार नियुक्त कर लिया | स्थानीय लोग उन्हें पेड़ों की देवी (द गॉडेस ऑफ ट्रीज) कहने लगे। तुलसी ने सरकारी नर्सरी में 65 वर्षों तक सेवाएं दीं। 1998 में आधिकारिक तौर पर रिटायर होने के बाद भी वे सलाहकार के रूप में सक्रिय हैं और पेड़-पौधों से जुड़ी मूल्यवान जानकारियां साझा करती हैं।
स्थानीय परिषद ने उनके घर के बाहर लकड़ी का पुल बना दिया है ताकि वे छोटी सी धारा को पार कर सकें। पर तुलसी इसका प्रयोग नहीं करतीं, उन्हें धारा के बीच से गुजरना ही अच्छा लगता है। वह कहती है जितना भी जीवन शेष है,पेड़ों के बीच बीते |‘सबसे अच्छी मौत वही होगी जो एक घनी शाखाओं वाले पेड़ के नीचे हो और दोबारा जन्म मिले तो एक बड़े पेड़ के रूप में धरती पर आना चाहेंगी। पेड़ - पौधों से धरती को हरा - भरा करने के लिए तुलसी गौड़ा को इंदिरा प्रियदर्शनी वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया | यह अवार्ड तुलसी को साल 1986 मे दिया गया था। इस पुरस्कार को आईपीवीएम पुरस्कार के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 1986 में इस दस्तावेज़ की शुरुआत पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा की गई थी। वर्ष 1999 में कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार तथा 2021 में राष्ट्रपति श्री रामनाथ जी द्वारा तुलसी गौड़ा को पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया।

