केतु { एकांत की यात्रा }
ज्ञान चाहिए .... मोक्ष चाहिए ........ मूल्य तो देना पड़ेगा |
सांसारिक सुख से वंचित होकर ,स्वयं के भीतर की यात्रा जितना आनंद प्रदान करने वाली है |उतनी ही पीड़ादायक है | है ... न ... बेमेल मेल
तन को रिश्तो और भौतिक संसाधनों का सुख , जिभ्या को स्वाद , नेत्रों को सुंदर दृश्य , मन- बुद्धि को प्रेम ,मान सम्मान चाहिए | परन्तु आत्मा को मोक्ष चाहिए | मोक्ष के लिए सांसारिक भोगो का त्याग आवश्यक है | आत्मा अपने लक्ष्य के लिए जिस माध्यम का चुनाव करती है | वह है मानव तन और मानव तन अनेक विषमताओ की गठरी है | इस गठरी में अहंकार ,क्रोध ,काम ,आसक्ति ,व्याधि आदि दोषों का भण्डार भरा पड़ा है | अब ऐसे तन को माध्यम बनाकर आत्मा परमतत्व से सम्बन्ध बनाना चाहती है |बहुत कठिन कार्य है |इस चुनौतीपूर्ण कार्य को केतु ही पूर्ण कर सकते है |
केतु कुंडली के जिस भाव में बैठे है | उसी स्थान से सम्बंधित संबंधो / स्थान पर आपको अपना बहुमूल्य समय देना है | मन -तन -बुद्धि को वहाँँ व्यय करने के उपरान्त आपको उस भाव से तिरस्कार मिलेगा | तिरस्कार का रूप व कारण भिन्न -भिन्न हो सकते है | परन्तु उपेक्षा ,अपमान और उलाहना केतु की उपस्थिति का अनिवार्य अनुबंध है |
सांसारिक /भौतिक सुखो को भोगने की लालसा करने वाले तन को उसी स्थान / घर /भाव से निष्काषित किया जाता है | जिस स्थान पर अपना सर्वस्व लुटा देता है तब आत्मा कहती है|
हे मानव तन .. अब मेरे अनुसार चल | तब संसार से उपेक्षित तन आत्मा को तृप्त करने हेतु मोक्ष प्राप्ति के लिए एकांत की यात्रा आरम्भ करता है | अपने भीतर ... मौन के साथ | मोक्ष मिलना न मिलना यह एकदम अलग विषय है | परन्तु मोक्ष का विचार आते ही जब एकांत की यात्रा आरम्भ होती है |तभी से आत्मा पुष्ट होने लगती है और ज्ञान की जाग्रति होने लगती है | जीवन में प्रेम का अभाव के बाद आत्मा का ज्ञान होना ही केतु प्रभाव है |
© संगीता राजपूत श्यामा
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